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श्री शिव चालीसा (Shree Shiv Chalisa): सम्पूर्ण पाठ, अर्थ, विधि और 15+ अद्भुत ला

प्रस्तावना: शिव ही सत्य है, शिव ही सुंदर है हर हर महादेव! सनातन धर्म में भगवान शिव को ‘आशुतोष’ कहा गया है, जिसका अर्थ है—जो बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। शिव की भक्ति के लिए कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं है, केवल सच्ची श्रद्धा और शिव चालीसा का पाठ ही आपके जीवन के बड़े से बड़े दुखों को हरने के लिए पर्याप्त है। शिव चालीसा चालीस चौपाइयों का वह दिव्य संग्रह है, जिसमें महादेव के स्वरूप, उनकी शक्ति और उनकी दयालुता का गुणगान किया गया है।

आज Pujapath.net के इस विशेष लेख में हम शिव चालीसा के एक-एक शब्द का अर्थ जानेंगे और यह समझेंगे कि इसका नियमित पाठ कैसे आपके जीवन में सौभाग्य और शांति ला सकता है।


1. शिव चालीसा का आध्यात्मिक महत्व (Significance)

शिव चालीसा का पाठ करने का अर्थ है—अपने भीतर की सोई हुई चेतना को जगाना। यह पाठ हमें बताता है कि शिव केवल कैलाश पर रहने वाले देवता नहीं, बल्कि हमारे भीतर की प्राण ऊर्जा हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में चंद्रमा कमज़ोर होता है या जो मानसिक अशांति से जूझ रहे होते हैं, उनके लिए शिव चालीसा किसी वरदान से कम नहीं है। यह पाठ आत्मविश्वास बढ़ाता है और मृत्यु के भय को जड़ से खत्म कर देता है।


2. श्री शिव चालीसा Shree Shiv Chalisa


||दोहा||

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

||चौपाई||


जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

||दोहा||


नित्त नेम कर प्रातः ही,पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,पूर्ण कीन कल्याण ॥

श्री शिव चालीसा – 2



अज अनादि अविगत अलख, अकल अतुल अविकार।
बंदौं शिव-पद-युग-कमल अमल अतीव उदार॥

आर्तिहरण सुखकरण शुभ भक्ति -मुक्ति -दातार।
करौ अनुग्रह दीन लखि अपनो विरद विचार॥

पर्यो पतित भवकूप महँ सहज नरक आगार।
सहज सुहृद पावन-पतित, सहजहि लेहु उबार॥

पलक-पलक आशा भर्यो, रह्यो सुबाट निहार।
ढरौ तुरन्त स्वभाववश, नेक न करौ अबार॥

जय शिव शङ्कर औढरदानी।
जय गिरितनया मातु भवानी॥

सर्वोत्तम योगी योगेश्वर।
सर्वलोक-ईश्वर-परमेश्वर॥

सब उर प्रेरक सर्वनियन्ता।
उपद्रष्टा भर्ता अनुमन्ता॥

पराशक्ति – पति अखिल विश्वपति।
परब्रह्म परधाम परमगति॥

सर्वातीत अनन्य सर्वगत।
निजस्वरूप महिमामें स्थितरत॥

अंगभूति – भूषित श्मशानचर।
भुजंगभूषण चन्द्रमुकुटधर॥

वृषवाहन नंदीगणनायक।
अखिल विश्व के भाग्य-विधायक॥

व्याघ्रचर्म परिधान मनोहर।
रीछचर्म ओढे गिरिजावर॥

कर त्रिशूल डमरूवर राजत।
अभय वरद मुद्रा शुभ साजत॥

तनु कर्पूर-गोर उज्ज्वलतम।
पिंगल जटाजूट सिर उत्तम॥

भाल त्रिपुण्ड्र मुण्डमालाधर।
गल रुद्राक्ष-माल शोभाकर॥

विधि-हरि-रुद्र त्रिविध वपुधारी।
बने सृजन-पालन-लयकारी॥

तुम हो नित्य दया के सागर।
आशुतोष आनन्द-उजागर॥

अति दयालु भोले भण्डारी।
अग-जग सबके मंगलकारी॥

सती-पार्वती के प्राणेश्वर।
स्कन्द-गणेश-जनक शिव सुखकर॥

हरि-हर एक रूप गुणशीला।
करत स्वामि-सेवक की लीला॥

रहते दोउ पूजत पुजवावत।
पूजा-पद्धति सबन्हि सिखावत॥

मारुति बन हरि-सेवा कीन्ही।
रामेश्वर बन सेवा लीन्ही॥

जग-जित घोर हलाहल पीकर।
बने सदाशिव नीलकंठ वर॥

असुरासुर शुचि वरद शुभंकर।
असुरनिहन्ता प्रभु प्रलयंकर॥

नम: शिवाय मन्त्र जपत मिटत सब क्लेश भयंकर॥

जो नर-नारि रटत शिव-शिव नित।
तिनको शिव अति करत परमहित॥

श्रीकृष्ण तप कीन्हों भारी।
ह्वै प्रसन्न वर दियो पुरारी॥

अर्जुन संग लडे किरात बन।
दियो पाशुपत-अस्त्र मुदित मन॥

भक्तन के सब कष्ट निवारे।
दे निज भक्ति सबन्हि उद्धारे॥

शङ्खचूड जालन्धर मारे।
दैत्य असंख्य प्राण हर तारे॥

अन्धकको गणपति पद दीन्हों।
शुक्र शुक्रपथ बाहर कीन्हों॥

तेहि सजीवनि विद्या दीन्हीं।
बाणासुर गणपति-गति कीन्हीं॥

अष्टमूर्ति पंचानन चिन्मय।
द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग ज्योतिर्मय॥

भुवन चतुर्दश व्यापक रूपा।
अकथ अचिन्त्य असीम अनूपा॥

काशी मरत जंतु अवलोकी।
देत मुक्ति -पद करत अशोकी॥

भक्त भगीरथ की रुचि राखी।
जटा बसी गंगा सुर साखी॥

रुरु अगस्त्य उपमन्यू ज्ञानी।
ऋषि दधीचि आदिक विज्ञानी॥

शिवरहस्य शिवज्ञान प्रचारक।
शिवहिं परम प्रिय लोकोद्धारक॥

इनके शुभ सुमिरनतें शंकर।
देत मुदित ह्वै अति दुर्लभ वर॥

अति उदार करुणावरुणालय।
हरण दैन्य-दारिद्रय-दु:ख-भय॥

तुम्हरो भजन परम हितकारी।
विप्र शूद्र सब ही अधिकारी॥

बालक वृद्ध नारि-नर ध्यावहिं।
ते अलभ्य शिवपद को पावहिं॥

भेदशून्य तुम सबके स्वामी।
सहज सुहृद सेवक अनुगामी॥

जो जन शरण तुम्हारी आवत।
सकल दुरित तत्काल नशावत॥

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|| दोहा ||


बहन करौ तुम शीलवश, निज जनकौ सब भार।
गनौ न अघ, अघ-जाति कछु, सब विधि करो सँभार

तुम्हरो शील स्वभाव लखि, जो न शरण तव होय।
तेहि सम कुटिल कुबुद्धि जन, नहिं कुभाग्य जन कोय

दीन-हीन अति मलिन मति, मैं अघ-ओघ अपार।
कृपा-अनल प्रगटौ तुरत, करो पाप सब छार॥

कृपा सुधा बरसाय पुनि, शीतल करो पवित्र।
राखो पदकमलनि सदा, हे कुपात्र के मित्र॥

।। इति श्री शिव चालीसा समाप्त ।।

3. शिव चालीसा पाठ की सही और प्रमाणिक विधि

शिव जी बहुत भोले हैं, लेकिन विधि के साथ पूजा करने से मन में अनुशासन आता है। Pujapath.net की इस विधि का पालन करें:

  1. समय: शिव चालीसा के पाठ के लिए सोमवार का दिन और ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) या प्रदोष काल (शाम का समय) सबसे उत्तम है।

  2. शुद्धि: स्नान के बाद सफेद या पीले वस्त्र धारण करें। शिव पूजा में काले वस्त्रों से परहेज करना चाहिए।

  3. स्थापना: शिवलिंग या शिव परिवार की तस्वीर के सामने बैठें। आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए।

  4. अभिषेक: पाठ शुरू करने से पहले शिवलिंग पर जल या गंगाजल चढ़ाएं।

  5. दीपक: गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं और चंदन की अगरबत्ती का प्रयोग करें।


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4. शिव चालीसा के 15+ चमत्कारी लाभ (Benefits)

नियमित रूप से शिव चालीसा का पाठ करने से आपके जीवन में ये बदलाव आएंगे:

  1. मानसिक शांति: आज की तनावपूर्ण दुनिया में यह मन को शांत करने का सबसे सरल माध्यम है।

  2. भय और असुरक्षा से मुक्ति: अनजाने डर और बुरे सायों का प्रभाव खत्म हो जाता है।

  3. आरोग्य की प्राप्ति: पुरानी बीमारियों और शारीरिक कष्टों में सुधार होने लगता है।

  4. संतान सुख: जो दंपत्ति संतान की इच्छा रखते हैं, उनके लिए यह पाठ फलदायी माना जाता है।

  5. कर्ज से मुक्ति: आर्थिक अड़चनें दूर होती हैं और आय के नए मार्ग खुलते हैं।

  6. ग्रह दोष निवारण: विशेषकर चंद्रमा और शनि के अशुभ प्रभावों को कम करता है।

  7. एकाग्रता: विद्यार्थियों के लिए फोकस और याददाश्त बढ़ाने में मददगार है।

  8. सद्बुद्धि: व्यक्ति के विचार सकारात्मक होते हैं और वह अधर्म के मार्ग से बचता है।

  9. सुखद वैवाहिक जीवन: पति-पत्नी के बीच कलह खत्म होती है और प्रेम बढ़ता है।

  10. पापों का नाश: जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है और मन शुद्ध होता है।

  11. आत्मविश्वास में वृद्धि: व्यक्ति हर चुनौती का सामना निडर होकर करता है।

  12. नकारात्मक ऊर्जा का खात्मा: घर का माहौल पवित्र और सुखद हो जाता है।

  13. रुके हुए काम: यदि कोई कार्य लंबे समय से अटका है, तो शिव कृपा से वह पूरा होता है।

  14. मोक्ष का मार्ग: अंततः यह पाठ जीव को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर शिव चरणों में स्थान दिलाता है।

  15. साहस और पराक्रम: व्यक्ति के व्यक्तित्व में ओज और गंभीरता आती है।


5. पाठ के दौरान क्या न करें? (Don’ts)

  • तामसिक भोजन: शिव चालीसा का पाठ करने वाले को मांस, मदिरा और नशीली चीज़ों से दूर रहना चाहिए।

  • अपमान: किसी भी जीव या असहाय व्यक्ति को कष्ट न पहुँचाएं, क्योंकि शिव हर जीव में बसते हैं।

  • अधूरी पूजा: पाठ के बाद आरती ज़रूर करें, बीच में पाठ छोड़कर न उठें।


6. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. क्या शिव चालीसा का पाठ रात में कर सकते हैं? हाँ, सोने से पहले या शाम के समय पाठ करना बहुत शांतिदायक होता है।

Q2. क्या महिलाएं शिव चालीसा पढ़ सकती हैं? जी हाँ, महिलाएं और पुरुष दोनों ही शिव चालीसा का पाठ कर सकते हैं। शिव जी सबके पिता हैं।

Q3. क्या बिना शिवलिंग के पाठ किया जा सकता है? बिल्कुल। आप महादेव की तस्वीर या मानसिक रूप से उनका ध्यान करके भी पाठ कर सकते हैं।


7. विशेष सुझाव

“विशेष सुझाव: शिव चालीसा का पाठ करने के बाद अंत में शिवलिंग पर एक बेलपत्र उल्टा करके (चिकनी सतह नीचे) चढ़ाएं और उस पर चंदन से ‘ॐ’ लिखें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि सोमवार के दिन पाठ के बाद ‘पंचाक्षरी मंत्र’ (ॐ नमः शिवाय) का 108 बार जाप करने से चालीसा की शक्ति कई गुना बढ़ जाती है और आपकी मनोकामना जल्दी पूरी होती है।”


8. निष्कर्ष: शिव ही आधार हैं

शिव चालीसा केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह महादेव से जुड़ने का एक सीधा रास्ता है। यदि आप इसे पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पढ़ते हैं, तो भोलेनाथ आपके जीवन के विष को हरकर उसे अमृत बना देंगे।

आशा है कि Pujapath.net की यह जानकारी आपके जीवन को शिवमय बनाएगी। कमेंट में “हर हर महादेव” ज़रूर लिखें!