प्रस्तावना: अखण्ड सौभाग्यवती भव… जय सावित्री माता! हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन का प्रतीक है। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या (और कुछ क्षेत्रों में पूर्णिमा) को मनाया जाता है। जिस प्रकार देवी सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और सतीत्व के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे, उसी श्रद्धा के साथ सुहागिन महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं।
आज Pujapath.net के इस विशेष लेख में हम आपको वट सावित्री माता की सम्पूर्ण आरती हिंदी लिरिक्स में प्रदान कर रहे हैं, साथ ही इस व्रत के महत्व और सही पूजन विधि के बारे में भी विस्तार से बताएंगे।
1. वट सावित्री आरती और व्रत का महत्व (Significance)
वट सावित्री व्रत में वट (बरगद) वृक्ष की पूजा की जाती है क्योंकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास इस वृक्ष में होता है। बरगद का वृक्ष दीर्घायु का प्रतीक है, इसलिए महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए इसकी पूजा करती हैं। आरती इस पूजा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो मन की श्रद्धा को देवी तक पहुँचाती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन पूजा करने से वैवाहिक जीवन के मंगल और बृहस्पति दोष दूर होते हैं।
2. श्री वट सावित्री माता की आरती (Lyrics in Hindi)
भक्तों, वट वृक्ष की परिक्रमा के बाद इस आरती को गाना अत्यंत शुभ माना जाता है:
दोहा:
अश्वपति की सुता तुम, सत्यवान की प्राण। यम से पति के प्राण ले, कीन्हा जग कल्याण॥
आरती:
जय देव, जय देव, जय सावित्री माता।
सत्यवान की प्राणप्रिया, तुम हो सुखदाता॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
अश्वपति की लाड़ली, सतीत्व की मूरत।
सब जग में छाई माँ, तुम्हारी पावन सूरत॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
सत्यवान जब काल के, वश में जाने लगे।
यमराज भी माता, तुमसे घबराने लगे॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
वट वृक्ष की छाया में, तुमने तप कीन्हा।
यम से अपने पति का, जीवन वापस लीन्हा॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
अखण्ड सौभाग्य का, वर जो कोई मांगे।
पाप ताप दुख उसके, कोसों दूर भागें॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
पहन सुहाग की चूनर, जो तेरा ध्यान धरे।
अटल रहे सुहाग उसका, खुशियों से घर भरे॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
धूप दीप नैवेद्य से, जो आरती तेरी गावे।
सावित्री माँ की कृपा से, परम पद पावे॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
जय देव, जय देव, जय सावित्री माता।
सत्यवान की प्राणप्रिया, तुम हो सुखदाता॥
॥ जय देव, जय देव… ॥
3. वट सावित्री पूजन और आरती की सही विधि (Step-by-Step)
इस व्रत में विधि का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। Pujapath.net की इस प्रामाणिक विधि का पालन करें:
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श्रृंगार: इस दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं। पीले या लाल वस्त्र पहनना बहुत शुभ माना जाता है।
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वट वृक्ष के पास स्थापना: बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री और सत्यवान की मूर्ति या तस्वीर रखें। वृक्ष की जड़ में जल अर्पित करें।
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पूजन सामग्री: भीगे हुए चने, फूल, फल, कलावा (सूती धागा), धूप और दीप।
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परिक्रमा और कलावा: बरगद के वृक्ष के चारों ओर 7, 11, 21 या 108 बार परिक्रमा करें और वृक्ष पर कच्चा सूत (कलावा) लपेटते जाएं।
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आरती और कथा: परिक्रमा के बाद वट सावित्री की कथा सुनें और अंत में घी के दीपक से माता की आरती करें।
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4. वट सावित्री व्रत और आरती के 15+ लाभ (Benefits)
नियमित और श्रद्धा से इस व्रत को करने से ये फल मिलते हैं:
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पति की लंबी आयु: यमराज के भय से मुक्ति मिलती है और पति को आरोग्य प्राप्त होता है।
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अखण्ड सौभाग्य: वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।
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संतान सुख: वंश वृद्धि के लिए यह व्रत बहुत प्रभावशाली माना गया है।
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पारिवारिक सुख: घर में खुशहाली आती है और कलह शांत होता है।
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धैर्य की प्राप्ति: देवी सावित्री की तरह भक्त में विपरीत परिस्थितियों से लड़ने का साहस आता है।
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ग्रह शांति: शुक्र और मंगल के दोष दूर होते हैं।
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पितृ दोष से मुक्ति: बरगद की पूजा से पितरों का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
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मानसिक शांति: प्रकृति (वृक्ष) के सानिध्य में पूजा करने से तनाव दूर होता है।
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आर्थिक उन्नति: घर में बरकत आती है।
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सतीत्व की शक्ति: महिलाओं के आत्मसम्मान और आत्मबल में वृद्धि होती है।
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रोग मुक्ति: वट वृक्ष की हवा और औषधीय गुणों का लाभ मिलता है।
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सामाजिक एकता: सभी महिलाएं मिलकर पूजा करती हैं, जिससे एकता बढ़ती है।
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संकल्प की सिद्धि: मनचाहा वरदान प्राप्त होता है।
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पुण्य की प्राप्ति: शास्त्रों के अनुसार यह व्रत कोटि यज्ञों के समान है।
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ईश्वर से जुड़ाव: त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) का सामूहिक आशीर्वाद मिलता है।
5. विशेष सावधानियां (Don’ts)
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पेड़ को नुकसान न पहुँचाएं: पूजा के दौरान बरगद की टहनियां या पत्ते न तोड़ें।
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काले वस्त्र वर्जित: इस दिन काले या गहरे नीले रंग के कपड़े न पहनें।
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झूठ न बोलें: व्रत के दौरान किसी की बुराई या झूठ बोलने से व्रत का फल नष्ट हो जाता है।
6. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. अगर आसपास बरगद का पेड़ न हो तो क्या करें? आप बरगद की एक छोटी टहनी लाकर गमले में स्थापित कर उसकी पूजा कर सकते हैं, या मानसिक रूप से वट वृक्ष का चित्र बनाकर पूजा करें।
Q2. क्या कुंवारी कन्याएं यह व्रत कर सकती हैं? हाँ, कुंवारी कन्याएं अच्छे पति की प्राप्ति और मनचाहे जीवनसाथी के लिए यह व्रत रख सकती हैं।
Q3. आरती के बाद भीगे चने का क्या महत्व है? भीगे चने को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है और इसे निगलने की परंपरा है, जो सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
7. विशेष सुझाव
“विशेष सुझाव: वट सावित्री की आरती के बाद अपने पति के चरणों का आशीर्वाद ज़रूर लें और उन्हें भीगे चने व फल का प्रसाद दें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि इस दिन किसी बुजुर्ग सुहागिन महिला को ‘सुहाग सामग्री’ (सिंदूर, चूड़ी, बिंदी) दान करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। ध्यान रखें, बरगद के पास पूजा के बाद दीपक को वहीं न छोड़ें, उसे सुरक्षित स्थान पर रखें।”
8. निष्कर्ष: अटूट विश्वास की विजय
वट सावित्री आरती और व्रत हमें सिखाते हैं कि प्रेम और समर्पण में इतनी शक्ति है कि वह होनी को भी अनहोनी कर सकता है। सावित्री की तरह हर महिला अपने परिवार के लिए सुरक्षा कवच बन सकती है।
आशा है कि Pujapath.net की यह जानकारी आपके सुहाग की रक्षा करेगी और घर में खुशियाँ लाएगी। कमेंट में “जय सावित्री माता” ज़रूर लिखें!

महेंद्र कौशिक –
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