प्रस्तावना: साल की सबसे कठिन और फलदायी एकादशी… जय श्री हरि! सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व है, लेकिन इन सभी में ‘निर्जला एकादशी’ को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस व्रत में अन्न के साथ-साथ जल का त्याग भी किया जाता है। माना जाता है कि यदि आप साल भर की अन्य 23 एकादशियों का व्रत नहीं कर पाते हैं, तो केवल निर्जला एकादशी का व्रत करने से उन सभी का फल प्राप्त हो जाता है।
आज Pujapath.net के इस विशेष लेख में हम साल 2026 में निर्जला एकादशी की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और इसके धार्मिक महत्व के बारे में विस्तार से जानेंगे।
1. निर्जला एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त (Date & Muhurat)
साल 2026 में निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून, गुरुवार को रखा जाएगा।
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एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जून 2026 को शाम 06:12 बजे से।
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एकादशी तिथि समाप्त: 25 जून 2026 को रात 08:09 बजे तक।
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उदयातिथि के अनुसार व्रत: 25 जून 2026 (गुरुवार)।
व्रत पारण का समय (Parana Time)
एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी मिलता है जब उसका पारण सही समय पर किया जाए।
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पारण तिथि: 26 जून 2026, शुक्रवार।
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पारण का समय: सुबह 05:25 बजे से 08:13 बजे के बीच।
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द्वादशी तिथि समाप्त: रात 10:22 बजे।
2. निर्जला एकादशी की पौराणिक कथा (Vrat Katha)
महाभारत काल में जब महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को एकादशी व्रत का महत्व बताया, तब भीमसेन ने कहा कि वे अपनी भूख को नियंत्रित नहीं कर सकते और महीने में दो बार उपवास करना उनके लिए असंभव है। तब व्यास जी ने उन्हें सुझाव दिया कि वे केवल ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी का व्रत करें। भीम ने इस कठिन व्रत को पूर्ण निष्ठा से किया, जिसके कारण उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसीलिए इसे ‘भीमसेनी एकादशी’ कहा जाता है।
3. निर्जला एकादशी व्रत के 15+ चमत्कारी लाभ (Benefits)
पूर्ण श्रद्धा से निर्जला एकादशी का व्रत करने से भक्त को ये दिव्य लाभ प्राप्त होते हैं:
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संपूर्ण एकादशियों का फल: साल भर की सभी 24 एकादशियों के पुण्य के बराबर फल मिलता है।
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पाप मुक्ति: जाने-अनजाने में हुए जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश होता है।
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इंद्रिय संयम: जल त्यागने से व्यक्ति का अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण बढ़ता है।
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दीर्घायु और आरोग्य: भगवान विष्णु की कृपा से साधक को लंबी आयु और उत्तम स्वास्थ्य मिलता है।
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आर्थिक समृद्धि: घर में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती।
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मोक्ष की प्राप्ति: मृत्यु के बाद विष्णु लोक (वैकुंठ) में स्थान मिलता है।
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ग्रह दोष शांति: विशेष रूप से सूर्य और चंद्रमा के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।
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मानसिक शांति: भीषण गर्मी में धैर्य रखने से मानसिक शक्ति और शांति बढ़ती है।
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संतान सुख: योग्य और संस्कारी संतान की प्राप्ति के योग बनते हैं।
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शत्रु विजय: जीवन की बाधाओं और विरोधियों पर विजय प्राप्त होती है।
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दान का पुण्य: इस दिन जल का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
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वैवाहिक सुख: पति-पत्नी के संबंधों में मधुरता आती है।
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कार्य सिद्धि: रुके हुए सरकारी या व्यक्तिगत काम पूरे होने लगते हैं।
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शुक्र ग्रह की मजबूती: भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि होती है।
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सात्विक जीवन: व्यक्ति के विचारों में शुद्धता और दया का भाव आता है।
4. व्रत और पूजन की विधि (Puja Vidhi)
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संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान के बाद भगवान विष्णु के सामने हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
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पूजन: पीले वस्त्र पहनकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन करें। उन्हें पीले फूल, चंदन और तुलसी दल अर्पित करें।
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दान: इस दिन मटका (कलश), पंखा, खरबूजा, सत्तू और जल का दान करना सबसे उत्तम माना गया है।
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जागरण: रात में भगवान का कीर्तन या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
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5. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. क्या निर्जला एकादशी में बीमार व्यक्ति को भी जल नहीं पीना चाहिए? नहीं, यदि आप बीमार हैं या शारीरिक रूप से निर्जल रहने में असमर्थ हैं, तो आप फलाहार और जल का सेवन कर सकते हैं। भगवान भाव देखते हैं, हठ नहीं।
Q2. इस दिन किस चीज का दान सबसे बड़ा है? भीषण गर्मी का समय होने के कारण ‘जल’ और ‘मिट्टी के घड़े’ का दान सबसे श्रेष्ठ है।
Q3. क्या निर्जला एकादशी के दिन तुलसी तोड़ सकते हैं? बिल्कुल नहीं। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। पूजा के लिए एक दिन पहले ही पत्ते तोड़कर रख लें।
6. विशेष सुझाव
“विशेष सुझाव: निर्जला एकादशी के दिन दान में दिए जाने वाले घड़े को जल से भरकर उसमें चीनी या गुड़ ज़रूर डालें। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जो व्यक्ति इस दिन प्यासे लोगों को जल या शर्बत पिलाता है, उसके जीवन की बड़ी से बड़ी बाधाएं पानी की तरह बह जाती हैं। व्रत के अगले दिन पारण के समय सबसे पहले किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएं, फिर स्वयं जल ग्रहण करें।”
7. निष्कर्ष: तपस्या और विश्वास का संगम
निर्जला एकादशी हमें अपनी इच्छाशक्ति को मज़बूत करना सिखाती है। यह केवल एक उपवास नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।
आशा है कि Pujapath.net की यह जानकारी आपके पाठकों के लिए कल्याणकारी सिद्ध होगी। कमेंट में “जय श्री हरि” ज़रूर लिखें!








